fermented organic manure

बरसात में पौधे प्यास से नहीं, दम घुटने से मरते हैं

जून के आखिर में जब पहली अच्छी बारिश होती है, बागवानी करने वाले लगभग सब राहत की सांस लेते हैं - चलो अब पानी देने की झंझट खत्म। तीन हफ्ते बाद वही लोग पूछते हैं कि पौधा अचानक मुरझा क्यों गया, जबकि मिट्टी तो गीली है।

यही मानसून का धोखा है। मानसून में पौधों की देखभाल का सबसे बड़ा हिस्सा पानी देना नहीं, पानी निकालना है।
जड़ों को सिर्फ पानी नहीं, हवा भी चाहिए। मिट्टी के कणों के बीच जो छोटी-छोटी खाली जगहें होती हैं, उनमें ऑक्सीजन भरी रहती है और जड़ें वहीं से सांस लेती हैं। लगातार बारिश में वे जगहें पानी से भर जाती हैं। जड़ें कुछ दिन तक झेलती हैं, फिर कमजोर पड़ती हैं, और उसके बाद मिट्टी में मौजूद फंगस उन्हीं कमजोर जड़ों पर हमला कर देता है। इसे जड़ सड़न (root rot) कहते हैं।

अच्छी खबर यह है कि जड़ सड़न अचानक नहीं आती। वह हफ्ते भर पहले से संकेत देती है, और ज़्यादातर मामलों में उसे रोकना इलाज करने से कहीं आसान होता है।

मानसून में पौधों को असली खतरा किससे है तीन चीज़ें एक साथ चलती हैं, और नुकसान तीनों के मेल से होता है।

एक - मिट्टी में हवा की कमी। गमला हो या क्यारी, अगर पानी निकलने का रास्ता नहीं है तो मिट्टी लगातार संतृप्त रहती है। जड़ें ऑक्सीजन के बिना कमजोर होने लगती हैं।

दो - फंगस के लिए बेहतरीन मौसम। नमी और 25 से 30 डिग्री के बीच का तापमान मिट्टी के हानिकारक फंगस के लिए आदर्श है। ये फंगस पहले से मिट्टी में मौजूद होते हैं; उन्हें सिर्फ मौका चाहिए, और कमजोर जड़ें वही मौका देती हैं।

तीन - पोषण का बह जाना। तेज़ बारिश में पानी मिट्टी से होकर नीचे निकलता है और घुलनशील पोषक तत्व, खासकर नाइट्रोजन, अपने साथ बहा ले जाता है। इसे leaching कहते हैं। इसीलिए मानसून के बीच में पत्तियां हल्की पड़ने लगती हैं - जड़ें बीमार हैं, और जो पोषण था वह भी बह गया।


जड़ सड़न के शुरुआती लक्षण - किसे किस तरह पढ़ें

आप क्या देख रहे हैं इसका क्या मतलब है पहला कदम
पौधा मुरझाया हुआ, पर मिट्टी गीली जड़ें पानी खींच नहीं पा रहीं - शुरुआती सड़न पानी बंद, गमला हवादार छायादार जगह पर
मिट्टी से खट्टी या सड़ी बदबू मिट्टी में ऑक्सीजन नहीं बची ऊपरी परत हटाएं, ड्रेनेज होल जांचें
तने का आधार नरम, भूरा, दबाने पर गीला सड़न जड़ से तने पर चढ़ रही है संक्रमित हिस्सा काटें, तुरंत नई मिट्टी में लगाएं
निचली पत्तियां पीली और झड़ना शुरू जड़ें पोषण नहीं भेज पा रहीं जड़ें जांचें, खाद न बढ़ाएं
मिट्टी की सतह पर हरी काई या सफेद जाली सतह लगातार गीली है धूप और हवा बढ़ाएं, ऊपरी मिट्टी बदलें
नई बढ़वार पूरी तरह रुक गई जड़ का ज़्यादा हिस्सा काम से बाहर गमला पलटकर जड़ें देखें



इनमें सबसे भरोसेमंद संकेत पहला है। मुरझाया पौधा और गीली मिट्टी एक साथ, यह जोड़ी लगभग हमेशा जड़ की समस्या बताती है, पानी की कमी नहीं। इसी मौके पर ज़्यादातर लोग और पानी डाल देते हैं और पौधा खत्म हो जाता है।


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ड्रेनेज - बरसात में गमलों की देखभाल का पहला काम

बरसात में गमलों की देखभाल की शुरुआत खाद से नहीं, ड्रेनेज से होती है। मानसून से पहले आधा घंटा निकालकर यह पांच चीज़ें देख लें, तो पूरा सीज़न आसान निकल जाता है।

● ड्रेनेज होल खुला है या नहीं। जड़ें, कंकड़ और जमी मिट्टी होल को बंद कर देती हैं। उंगली या लकड़ी की सींक से जांचें। पानी डालकर देखें - एक मिनट में नीचे से निकलना चाहिए।
● तश्तरी खाली रखें। तश्तरी में जमा पानी गमले की मिट्टी को नीचे से गीला रखता है। मानसून में तश्तरी हटा देना सबसे आसान उपाय है।
● गमले को ज़मीन से उठाएं। ईंट, लकड़ी के टुकड़े या पॉट स्टैंड पर रखें, ताकि नीचे से हवा गुज़रे और होल फर्श से चिपककर बंद न हो।
● मिट्टी का मिक्स हल्का करें। भारी चिकनी मिट्टी बरसात में ईंट बन जाती है। कोकोपीट, मोटी रेत या परलाइट और जैविक पदार्थ मिलाकर मिक्स को छिद्रदार रखें। पानी रुके नहीं, नमी बनी रहे - संतुलन यही है।
● गमले का आकार देखें। बहुत बड़े गमले में छोटा पौधा जोखिम में रहता है, क्योंकि बची हुई मिट्टी सूखती ही नहीं। जड़ के हिसाब से गमला रखें।



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टेरेस गार्डन में एक बात और - जहां गमले रखे हैं वहां पानी की ढलान देख लें। छत पर पानी जमा होता है तो गमले नीचे से पानी सोखते रहते हैं। क्यारी या खेत में मेड़ ऊंची करना और पानी निकासी की नाली बनाना यही काम करता है।



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इस मौसम में पानी और खाद कैसे adjust करें


पानी: कैलेंडर भूल जाइए। हर बार उंगली दो इंच मिट्टी में डालकर देखें - गीली लगे तो पानी नहीं। लगातार बारिश के दिनों में हफ्तों तक पानी देने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और अगर तीन-चार दिन झड़ी लगी हो, तो गमले शेड या छज्जे के नीचे खिसका देना सबसे समझदारी का काम है।
खाद: यहां दो गलतियां आम हैं, और दोनों उलटी दिशा में हैं।
पहली - मानसून में तेज़ नाइट्रोजन देना। यूरिया जैसी चीज़ बारिश में दो तरह से नुकसान करती है: बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है, और जो असर करता है वह मुलायम, रसीली बढ़वार पैदा करता है जिस पर फंगस और कीड़े सबसे पहले बैठते हैं। ज़्यादा पानी से नुकसान और ज़्यादा खाद से नुकसान मानसून में एक-दूसरे को बढ़ाते हैं।
दूसरी - डर के मारे खाद पूरी बंद कर देना। पोषण तो बह ही रहा है, इसलिए पौधे को सहारा चाहिए। रास्ता बीच का है: मात्रा घटाइए, अंतराल बढ़ाइए, और धीमी रिलीज़ वाली जैविक खाद चुनिए जो एक झटके में नहीं, धीरे-धीरे पोषण छोड़े। पत्तों पर छिड़काव करना हो तो सुबह का समय चुनें, जब दिन में पत्तियां सूख सकें। शाम को भीगी पत्तियां रातभर गीली रहती हैं और यही फंगल स्पॉट की शुरुआत है।

जड़ सड़न शुरू हो गई हो तो क्या करें


अगर तने का आधार अभी मजबूत है, तो पौधा बचने के अच्छे मौके हैं। जल्दी करें, पर ठीक क्रम में।
1. पौधे को गमले से सावधानी से निकालें और जड़ों की मिट्टी हल्के हाथ से झाड़ दें।
2. जड़ें साफ पानी से धोकर देखें। स्वस्थ जड़ें सफेद या क्रीम और मजबूत होती हैं; सड़ी जड़ें भूरी-काली, चिपचिपी और छूने पर टूट जाती हैं।
3. साफ कैंची से हर खराब जड़ काट दें। आधी से ज़्यादा जड़ें जानी पड़ें तो भी काटें - सड़ी जड़ छोड़ने से संक्रमण फैलता ही है।
4. ऊपर की एक-तिहाई पत्तियां भी हटा दें। कम जड़ें कम पत्तियों को ही संभाल सकती हैं।
5. ताज़ी, हल्की और छिद्रदार मिट्टी में लगाएं। गमला पहले से थोड़ा छोटा लें, बड़ा नहीं।
6. अगले दो हफ्ते खाद बिलकुल न दें, गमला छाया में रखें, और पानी सिर्फ मिट्टी सूखने पर।



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यह आखिरी कदम सबसे ज़रूरी है और सबसे ज़्यादा तोड़ा जाता है। बीमार जड़ें पोषण सोख नहीं सकतीं; उस हालत में खाद देना मदद नहीं, दबाव है।


जैविक समाधान - रूट ज़ोन को मजबूत कैसे रखें


साफ बात पहले: कोई खाद खराब ड्रेनेज की भरपाई नहीं कर सकती। अगर गमले में पानी भरा रहता है, तो दुनिया का कोई प्रोडक्ट पौधा नहीं बचाएगा। ड्रेनेज आपका काम है।
लेकिन इसके आगे एक असली फर्क है, और वह मिट्टी के चरित्र का है। जड़ सड़न हर गीली मिट्टी में समान रूप से नहीं होती। जिस मिट्टी में जैविक कार्बन ठीक है और लाभकारी सूक्ष्मजीव जिंदा हैं, वह मिट्टी दो कारणों से ज़्यादा टिकती है - उसकी बनावट भुरभुरी रहती है इसलिए पानी रुकता नहीं, और उसमें मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव जगह और भोजन के लिए हानिकारक फंगस से मुकाबला करते हैं। मरी हुई, सख्त, कार्बन-रहित मिट्टी में फंगस को खुला मैदान मिलता है।
फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर यहीं काम आता है। यह बायोगैस प्लांट की डाइजेस्टेड स्लरी को नियंत्रित फर्मेंटेशन से गुज़ारकर बनाई गई जैविक खाद है, और इसमें जैविक कार्बन, माइक्रो-न्यूट्रिएंट और जीवित लाभकारी सूक्ष्मजीव तीनों होते हैं।



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मानसून के हिसाब से इसके तीन फायदे मायने रखते हैं:

● मिट्टी की बनावट सुधरती है - जैविक पदार्थ मिट्टी को भुरभुरा रखता है, जिससे बारिश का पानी ठहरने के बजाय निकलता है
● पोषण धीरे-धीरे छूटता है - इसलिए एक झटके में मुलायम बढ़वार नहीं होती और बारिश में बहकर बर्बाद भी कम होता है
● जड़ों के आसपास जीवाणु संतुलन बनता है - लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय रहें तो हानिकारक फंगस को पैर जमाने की जगह कम मिलती है

मानसून में मात्रा का नियम सीधा है: कम दो, अंतराल बड़ा रखो। ग्रैन्यूल महीने में एक बार मिट्टी में मिलाइए, और LFOM लिक्विड को पैकेट पर दी गई मात्रा से हल्का घोलकर बीच में एक बार दीजिए - वह भी उस दिन जब बारिश रुकी हो और मिट्टी बहुत गीली न हो।


मानसून के बाद - असली रिकवरी यहीं होती है

बारिश थमने के बाद के दो हफ्ते पूरे सीज़न के सबसे कीमती दिन हैं। मिट्टी में नमी है, तापमान ठीक है, और पौधा नई जड़ें बनाने को तैयार है।
इस समय ऊपरी दो इंच मिट्टी हल्के से खुरचकर ढीली कर दें, जैविक खाद की एक खुराक दें, और सूख चुकी या धब्बेदार पत्तियां साफ कर दें। जो पौधे मानसून में रुके हुए थे, उनमें दस से पंद्रह दिन में नई बढ़वार दिखने लगेगी। बस उसी को देखिए - पुरानी खराब पत्तियां वापस हरी नहीं होंगी।


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करें / न करें

करें
मानसून से पहले हर गमले का ड्रेनेज होल जांचें
तश्तरियां हटा दें या रोज़ खाली करें
गमलों को ईंट या स्टैंड पर उठाकर रखें
पानी देने से पहले हर बार मिट्टी छूकर देखें
खाद की मात्रा घटाकर अंतराल बढ़ाएं
छिड़काव सुबह करें, शाम को नहीं
न करें
मुरझाया पौधा देखकर गीली मिट्टी में और पानी न डालें
बरसात में यूरिया या तेज़ रासायनिक खाद न दें
सड़ी जड़ों वाले पौधे को खाद न दें
लगातार झड़ी में गमले खुले में न छोड़ें
जड़ सड़न वाले पौधे को बड़े गमले में न लगाएं - छोटा गमला ही ठीक है
संक्रमित मिट्टी दूसरे गमलों में दोबारा इस्तेमाल न करें